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ज्ञान षट्कम • Jnana Shatkam

अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga)

शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) का भेद • The Yoga of Distinguishing Field and Knower

Complete 35 Sacred Shlokas with Sanskrit Devanagari, IAST Transliteration, Hindi & English Meanings

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 1 (Verse 13.1)

प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥ १३.१॥

हिंदी: अर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।

English: Arjuna said, "I wish to learn about Nature and the Spirit, the field and the knower of the field, knowledge and that which ought to be known, O Kesava."

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 2 (Verse 13.2)

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥ १३.२॥

हिंदी: श्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

English: The Blessed Lord said, "O Arjuna, this body is called the field; he who knows it is called the knower of the field by those who know them."

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 3 (Verse 13.3)

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥ १३.३॥

हिंदी: हे भारत ! तुम समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तव में) ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है।।

English: Do thou also know Me as the knower of the field in all fields, O Arjuna. Knowledge of both the field and the knower of the field is considered by Me to be the knowledge.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 4 (Verse 13.4)

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु॥ १३.४॥

हिंदी: इसलिये, वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है, और जिस (कारण) से जो (कार्य) हुआ है तथा वह (क्षेत्रज्ञ) भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह संक्षेप में मुझसे सुनो।।

English: Hear from Me in brief what the field is, of what nature it is, what its modifications are, whence it is, who He is, and what His powers are.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 5 (Verse 13.5)

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः॥ १३.५॥

हिंदी: (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विषय में) ऋषियों द्वारा विभिन्न और विविध छन्दों में बहुत प्रकार से गाया गया है, तथा सम्यक् प्रकार से निश्चित किये हुये युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा (अर्थात् ब्रह्म के सूचक शब्दों द्वारा) भी (वैसे ही कहा गया है)।।

English: Sages have sung in many ways, with various distinctive chants and also with suggestive words indicative of the Absolute, full of reasoning and decisive.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 6 (Verse 13.6)

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥ १३.६॥

हिंदी: पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन, इन्द्रियों के पाँच विषय।।

English: The great elements, egoism, intellect, and also the Unmanifested Nature, the ten senses, and one mind, and the five objects of the senses.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 7 (Verse 13.7)

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥ १३.७॥

हिंदी: इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात (स्थूलदेह), चेतना (अन्त:करण की चेतन वृत्ति) तथा धृति - इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।।

English: Desire, hatred, pleasure, pain, the aggregate (body), intelligence, and fortitude—the field has thus been briefly described with its modifications.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 8 (Verse 13.8)

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥ १३.८॥

हिंदी: अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।

English: Humility, unpretentiousness, non-injury, forgiveness, uprightness, service to the teacher, purity, steadfastness, and self-control.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 9 (Verse 13.9)

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥ १३.९॥

हिंदी: इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन...৷৷.।।

English: Indifference to the objects of the senses and also absence of egoism; perceiving the evil in birth, death, old age, sickness, and pain.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 10 (Verse 13.10)

असक्ितरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥ १३.१०॥

हिंदी: आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।।

English: Non-attachment, non-identification of the Self with son, wife, home, and the rest, and constant even-mindedness in the face of the attainment of both desirable and undesirable.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 11 (Verse 13.11)

मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी।विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥ १३.११॥

हिंदी: अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।।

English: Unswerving devotion to Me through the Yoga of non-separation, resorting to solitary places, and a distaste for the company of people.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 12 (Verse 13.12)

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥ १३.१२॥

हिंदी: अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।।

English: Constancy in Self-knowledge, the perception of the end of true knowledge—this is declared to be knowledge, and what is opposed to it is ignorance.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 13 (Verse 13.13)

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते।अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥ १३.१३॥

हिंदी: मैं उस ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। वह ज्ञेय है - अनादि, परम ब्रह्म, जो न सत् और न असत् ही कहा जा सकता है।।

English: I will declare that which is to be known, knowing which one attains immortality; the beginningless Supreme Brahman, which is neither being nor non-being.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 14 (Verse 13.14)

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ १३.१४॥

हिंदी: वह सब ओर हाथ-पैर वाला है और सब ओर से नेत्र, शिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है; वह जगत् में सबको व्याप्त करके स्थित है।।

English: With hands and feet everywhere, with eyes, heads, and mouths everywhere, with ears everywhere, He exists in the worlds, enveloping all.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 15 (Verse 13.15)

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥ १३.१५॥

हिंदी: वह समस्त इन्द्रियों के गुणो (कार्यों) के द्वारा प्रकाशित होने वाला, परन्तु (वस्तुत:) समस्त इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति रहित तथा गुण रहित होते हुए भी सबको धारणपोषण करने वाला और गुणों का भोक्ता है।।

English: Shining by the functions of all the senses, yet without being attached to them; unattached, yet supporting all; devoid of qualities, yet the experiencer of them.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 16 (Verse 13.16)

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥ १३.१६॥

हिंदी: (वह ब्रह्म) भूत मात्र के अन्तर्बाह्य स्थित है; वह चर है और अचर भी। सूक्ष्म होने से वह अविज्ञेय है; वह सुदूर और अत्यन्त समीपस्थ भी है।।

English: It is within and without all beings, both the unmoving and the moving; It is subtle and unknowable, and It is near and far away.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 17 (Verse 13.17)

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥ १३.१७॥

हिंदी: और वह अविभक्त है, तथापि वह भूतों में विभक्त के समान स्थित है। वह ज्ञेय ब्रह्म भूतमात्र का भर्ता, संहारकर्ता और उत्पत्ति कर्ता है।।

English: Undivided yet, It exists as if divided in beings; It is to be known as the supporter of beings; It devours and It generates.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 18 (Verse 13.18)

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥ १३.१८॥

हिंदी: (वह ब्रह्म) ज्योतियों की भी ज्योति और (अज्ञान) अन्धकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान (चैतन्यस्वरूप) ज्ञेय और ज्ञान के द्वारा जानने योग्य (ज्ञानगम्य) है। वह सभी के हृदय में स्थित है।।

English: That Light of all lights is said to be beyond darkness: knowledge, the knowable, and the goal of knowledge, seated in the hearts of all.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 19 (Verse 13.19)

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥ १३.१९॥

हिंदी: इस प्रकार, (मेरे द्वारा) क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेपत: कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर (विज्ञाय) मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

English: Thus, the field, as well as knowledge and the knowable, have been briefly stated. My devotee, knowing this, enters into My being.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 20 (Verse 13.20)

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्॥ १३.२०॥

हिंदी: प्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।।

English: Know that Nature (matter) and the Spirit are both beginningless, and know also that all modifications and qualities are born from Nature.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 21 (Verse 13.21)

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥ १३.२१॥

हिंदी: कार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष सुख-दु:ख के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।।

English: In the production of the effect and the cause, Nature (matter) is said to be the cause; in the experience of pleasure and pain, the soul is said to be the one responsible.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 22 (Verse 13.22)

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥ १३.२२॥

हिंदी: प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही इस पुरुष (जीव) के शुभ और अशुभ योनियों में जन्म लेने का कारण है।।

English: The soul seated in Nature experiences the qualities born of Nature; attachment to the qualities is the cause of its birth in good and evil wombs.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 23 (Verse 13.23)

उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥ १३.२३॥

हिंदी: परम पुरुष ही इस देह में उपद्रष्टा, अनुमन्ता ,भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।।

English: The Supreme Soul in this body is also called the observer, the permitter, the sustainer, the enjoyer, the great Lord, and the Supreme Self.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 24 (Verse 13.24)

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैःसह।सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥ १३.२४॥

हिंदी: इस प्रकार पुरुष और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य जानता है, वह सब प्रकार से रहता हुआ (व्यवहार करता हुआ) भी पुन: नहीं जन्मता है।।

English: He who thus knows the Spirit and Matter together with their qualities, in whatever condition he may be, he is not reborn.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 25 (Verse 13.25)

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥ १३.२५॥

हिंदी: कोई पुरुष ध्यान के अभ्यास से आत्मा को आत्मा (हृदय) में आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा देखते हैं; अन्य लोग सांख्य योग के द्वारा तथा कोई साधक कर्मयोग से (आत्मा को देखते हैं )।।

English: Some behold the Self within themselves through meditation, others through the Yoga of knowledge, and still others through the Yoga of action.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 26 (Verse 13.26)

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥ १३.२६॥

हिंदी: परन्तु, अन्य लोग जो स्वयं इस प्रकार न जानते हुए, दूसरों से (आचार्यों से) सुनकर ही उपासना करते हैं, वे श्रुतिपरायण (अर्थात् श्रवण ही जिनके लिए परम साधन है) लोग भी मृत्यु को नि:सन्देह तर जाते हैं।।

English: Others, too, who do not know thus, worship, having heard of It from others; they, too, cross beyond death, regarding what they have heard as the supreme refuge.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 27 (Verse 13.27)

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥ १३.२७॥

हिंदी: हे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।

English: Wherever a being is born, whether unmoving or moving, know thou, O best of the Bharatas (Arjuna), that it is from the union of the field and its knower.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 28 (Verse 13.28)

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ १३.२८॥

हिंदी: जो पुरुष समस्त नश्वर भूतों में अनश्वर परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।

English: He who sees the Supreme Lord existing truly in all beings, the imperishable within the perishable, sees indeed.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 29 (Verse 13.29)

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥ १३.२९॥

हिंदी: निश्चय ही, वह पुरुष सर्वत्र सम भाव से स्थित परमेश्वर को समान हुआ आत्मा (स्वयं) के द्वारा आत्मा (स्वयं) का नाश नहीं करता है, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।।

English: For he who truly sees the same Lord dwelling everywhere does not destroy the Self by the self; rather, he attains the highest goal.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 30 (Verse 13.30)

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति॥ १३.३०॥

हिंदी: जो पुरुष समस्त कर्मों को सर्वश: प्रकृति द्वारा ही किये गये देखता है तथा आत्मा को अकर्ता देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।

English: He sees, who sees that all actions are performed solely by Nature and that the Self is without action.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 31 (Verse 13.31)

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ १३.३१॥

हिंदी: यह पुरुष जब भूतों के पृथक् भावों को एक (परमात्मा) में स्थित देखता है तथा उस (परमात्मा) से ही यह विस्तार हुआ जानता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।।

English: When a person sees all beings as resting in the One and emanating from the One alone, they then become Brahman.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 32 (Verse 13.32)

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥ १३.३२॥

हिंदी: हे कौन्तेय ! अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ भी, वस्तुत:, वह न (कर्म) करता है और न (फलों से) लिप्त होता है।।

English: Being without beginning, devoid of any qualities, the Supreme Self, imperishable, though dwelling in the body, O Arjuna, neither acts nor is tainted.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 33 (Verse 13.33)

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते॥ १३.३३॥

हिंदी: जिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।

English: As the all-pervading ether is not tainted, due to its subtlety, so the Self seated everywhere in the body is not tainted either.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 34 (Verse 13.34)

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥ १३.३४॥

हिंदी: हे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।।

English: Just as the one sun illuminates the entire world, so too does the Lord of the field (Supreme Self) illuminate the entire field, O Arjuna.

🕉️ अध्याय 13, श्लोक 35 (Verse 13.35)

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥ १३.३५॥

हिंदी: इस प्रकार, जो पुरुष ज्ञानचक्षु के द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्रकृति के विकारों से मोक्ष को जानते हैं, वे परम ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।

English: They who, by the eye of knowledge, perceive the distinction between the field and its knower, as well as the liberation from the Nature of being, go to the Supreme.

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